
भारत में यह संवेदनशील मुद्दा इसलिए था कि स्वेतलाना ने भारत आकर यह किया था और तब भारत के सोवियत संघ और अमेरिका दोनों से अच्छे रिश्ते थे। भारत पूरी तरह सोवियत कैंप में नहीं गया था, लेकिन भारतीय विदेश नीति का झुकाव सोवियत संघ की ओर था। अमेरिका भी इसे तूल नहीं देना चाहता था, क्योंकि तब अमेरिका-रूस संबंधों में थोड़ी बेहतरी आने लगी थी। ऐसे में स्वेतलाना को पहले स्विट्जरलैंड भेजा गया और वहां से कुछ समय बाद वह अमेरिका गईं।
यह कहानी इस बात का भी प्रमाण है कि राजनीति और विचारधारा के झगड़े किसी की व्यक्तिगत जिंदगी को कितना प्रभावित करते हैं। बृजेश और स्वेतलाना के मामले में यह इसलिए भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि वह २०वीं शताब्दी के सबसे विवादास्पद व्यक्तित्वों में से एक की संतान थी।
तानाशाह स्टालिन की बेटी स्वेतलाना ने कालाकांकर के राजकुमार ब्रजेश सिंह से रिश्तों की पींगें बढ़ाई थीं, तब भूचाल उठ खड़ा हुआ था। भारत और सोवियत संघ की दोस्ती शुरुआती दौर में थी और उसके तन्तुओं को अभी मजबूत होना बाकी था। पर सियासत अपनी जगह, प्यार अपनी जगह। दोनों ने जिंदगी के अंतिम समय तक प्रेम की रीति को निभाया। ब्रजेश सिंह की मृत्यु के बाद स्वेतलाना उनकी अस्थियों को लेकर भारत आई थीं। उन्हें मालूम था कि हम हिन्दुस्तानियों की सबसे बड़ी इच्छा गंगा की गोद में विलीन हो जाना ही होती है। बाद में अप्रैल १९६७ में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था कि मैं ब्रजेश सिंह की पत्नी हूँ।